सोमवार, 8 जनवरी 2024

मां बनाती थी रोटी...

 माँ बनाती थी रोटी 

पहली गाय की 

आखरी कुत्ते की 

एक बामणी दादी की 

एक मेहतरानी बाई की 

... 


हरसुबह

सांड आ जाता 

दरवाज़े पर 

गुड की डली के लिए 

....


चिड़ियों का चुग्गा 

चींटी व कीड़ों का आटा

ग्यारस,अमावस,पूनम का सीधा 

डाकौत का तेल

काली कुतिया के ब्याने पर

तेल गुड का हलवा

सब कुछ निकल आता था

उस घर से

जिस में विलासिता के नाम पर

एक टेबल पंखा था

....

 

आज धन धान्य से भरे घर से

कुछ भी नहीं निकलता

सिवाय कर्कश आवाजों के

कुंठित विचारों के 

......


~अज्ञात

फिर भी न जाने क्यूं पिता पीछे रह जाता है..!

 



माँ,  नौ महीने पालती है 

पिता, 25 साल पालता है 

फिर भी न जाने क्यूं पिता पीछे रह जाता है।


माँ, बिना तानख्वाह घर का सारा काम  करती है 

पिता, पूरी कमाई घर पे लुटा देता है 

फिर भी न जाने क्यूं पिता पीछे रह जाता है।


माँ ! जो चाहते हो वो बनाती है 

पिता ! जो चाहते हो वो ला के देता है 

फिर भी न जाने क्यूं पिता पीछे रह जाता है।


माँ ! को याद करते हो जब चोट लगती है 

पिता ! को याद करते हो जब ज़रुरत पड़ती है 

फिर भी न जाने क्यूं पिता पीछे रह जाता है।


माँ की और बच्चों की अलमारी नये कपड़े से भरी है 

पिता, कई सालो तक पुराने कपड़े चलाता है 

फिर भी न जाने क्यूं पिता पीछे रह जाता है।


पिता, अपनी जरूरतें टाल कर सबकी जरूरतें समय से पूरी करता है

किसी को उनकी जरूरतें टालने को नहीं कहता 

फिर भी न जाने क्यूं पिता पीछे रह जाता है।


जीवनभर दूसरों से आगे रहने की कोशिश करता है मगर हमेशा परिवार के पीछे रहता है, शायद इसीलिए क्योकि वो पिता है । 



पिता: तुम और मैं पति - पत्नी थे, तुम माँ बन गईं मैं पिता रह गया।

 


तुम और मैं पति पत्नी थे, तुम माँ बन गईं मैं पिता रह गया।

तुमने घर सम्भाला, मैंने कमाई,

लेकिन तुम "माँ के हाथ का खाना" बन गई,

मैं कमाने वाला पिता रह गया।


बच्चों को चोट लगी और तुमने गले लगाया,

मैंने समझाया,

तुम ममतामयी बन गई

मैं पिता रह गया।

बच्चों ने गलतियां कीं,

तुम पक्ष ले कर "understanding Mom" बन गईं 

और मैं "पापा नहीं समझते" वाला पिता रह गया।


"पापा नाराज होंगे" कह कर

तुम बच्चों की बेस्ट फ्रेंड बन गईं,

और मैं गुस्सा करने वाला पिता रह गया।

तुम्हारे आंसू में मां का प्यार 

और मेरे छुपे हुए आंसुओं मे, मैं निष्ठुर पिता रह गया।


तुम चंद्रमा की तरह शीतल बनतीं गईं,

और पता नहीं कब

मैं सूर्य की अग्नि सा पिता रह गया।


तुम धरती माँ, भारत मां और मदर नेचर बनतीं गईं,

और मैं जीवन को प्रारंभ करने का दायित्व लिए

सिर्फ एक पिता रह गया...।



डायरी की शायरी, कुछ चुनिंदा शेर

 ज़माना वो भी था जब सबसे ख़ास थे तुम,

ज़माना ये भी है अब कोई ज़िक्र नहीं तुम्हारा।


कल ही तो तौबा की मैंने शराब से

कम्बख्त मौसम आज फिर बेईमान हो गया...।

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

दो रूबाइयां



१)
जानकर तेरी हक़ीक़त, डूबकर जज़्बात में,
लिखी है मैंने भी एक दिलक़श कहानी रात में।
अगर तुझे भी शौक़ हो, पढ़ने का 'कातिल -ए -शरद',
क़ब्र पर एक बार, आ जाना अंधेरी रात में।


२)
मुझसे हर शख्स यहां ख़फा क्यों है?
हर कोई होता है ग़र बेवफ़ा, तो ज़माने में नाम- ए- वफ़ा क्यों है?
नसीब बनाना तो ठीक, मगर बिगाड़ता भी है,
फिर सितमगर! बता तू खुदा क्यों है?

मांझी और तूफान

डगमग डोंगी करे, मगर मन अचल रहे, तूफानों के बीच, मांझी अटल रहे! मंजिल की ले चाह जूझता रहे निरंतर, डटा रहे पतवार लिए, हो बीच समंदर। ऐसे मांझी से, हर मौजें मात खाएंगी, दूर किनारे तक, खुद उसको पहुंचाएंगी। - सिद्धार्थ मौर्य 'शरद' 29 जून 2014 को।

मां बनाती थी रोटी...

 माँ बनाती थी रोटी  पहली गाय की  आखरी कुत्ते की  एक बामणी दादी की  एक मेहतरानी बाई की  ...  हरसुबह सांड आ जाता  दरवाज़े पर  गुड की डली के लि...