गुरुवार, 22 नवंबर 2018

दो रूबाइयां



१)
जानकर तेरी हक़ीक़त, डूबकर जज़्बात में,
लिखी है मैंने भी एक दिलक़श कहानी रात में।
अगर तुझे भी शौक़ हो, पढ़ने का 'कातिल -ए -शरद',
क़ब्र पर एक बार, आ जाना अंधेरी रात में।


२)
मुझसे हर शख्स यहां ख़फा क्यों है?
हर कोई होता है ग़र बेवफ़ा, तो ज़माने में नाम- ए- वफ़ा क्यों है?
नसीब बनाना तो ठीक, मगर बिगाड़ता भी है,
फिर सितमगर! बता तू खुदा क्यों है?

मांझी और तूफान

डगमग डोंगी करे, मगर मन अचल रहे, तूफानों के बीच, मांझी अटल रहे! मंजिल की ले चाह जूझता रहे निरंतर, डटा रहे पतवार लिए, हो बीच समंदर। ऐसे मांझी से, हर मौजें मात खाएंगी, दूर किनारे तक, खुद उसको पहुंचाएंगी। - सिद्धार्थ मौर्य 'शरद' 29 जून 2014 को।

मां बनाती थी रोटी...

 माँ बनाती थी रोटी  पहली गाय की  आखरी कुत्ते की  एक बामणी दादी की  एक मेहतरानी बाई की  ...  हरसुबह सांड आ जाता  दरवाज़े पर  गुड की डली के लि...