सोमवार, 8 जनवरी 2024

डायरी की शायरी, कुछ चुनिंदा शेर

 ज़माना वो भी था जब सबसे ख़ास थे तुम,

ज़माना ये भी है अब कोई ज़िक्र नहीं तुम्हारा।


कल ही तो तौबा की मैंने शराब से

कम्बख्त मौसम आज फिर बेईमान हो गया...।




पढ़ाई के झंझट पाले और मोहब्बत भी कर ली ,

दो दो जुल्म किए हैं मैंने,अपनी एक जवानी पर ।


मैं तुम्हें चांद कह दूं, ये मुमकिन तो है..!!

मगर लोग तुम्हें रात भर देखें ये हमें गवारा नही है..!! ❤


ये कैसा तेरा ख्याल है ,, जो मेरा हाल बदल देती है,

तू दिसंबर की तरह है ,, जो पूरा साल बदल देती है...।


तुम महसूस ही ना करो ये अलग बात है ,

हवा बन के तुम्हारे पास से रोज गुजरते हैं हम.।



हैरत से न देख मेरे चेहरे की दरारें,

मैं वक्त के हाथों में खिलौने की तरह था।


मेरे जीवन की पहली कविता हो तुम

"मछली जल की रानी हो तुम"...❤️


किस चीज़ का बनवाती हो लिबास तुम अपना ,

कपड़ा तो इस आग को छूकर जल जाता होगा..


खामोशी से भरी निगाहें काश वो पहचान लें... 

डरूं मै जब भी वो हमे सम्भाल लें..!! 

काश ऐसा हो... 

बिन कुछ कहे, बिन कुछ सुने... 

वो मेरा हाल जान लें...💜


__तेरे खत आज लतीफे की तरह लगते है..!!

खूब हंसता हूं जहां ' लफ़्ज़ - ए - वफ़ा' आता है..!!🖤


निखरी है मेरी मुहब्बत, तेरी हर अजमाइश के बाद,

संवरता जा रहा इश्क़, तेरी हर फरमाइश के बाद ।


हर तरफ़ राह में थे कांटे बिछे हुए,

मुझको तेरी तलब थी गुज़रता चला गया।


उसका पता भी था और उसका नंबर भी था, 

मगर एक शरीफ शख्स हमारे अंदर भी था।🤍


वो मुझको बताती थी परेशानियां दिल की

 मैं माथा चूम के कहता था, खुदा खैर करेगा।


दूर तो तुम उसी  दिन हो गये,

 जिस दिन तुमको हमने चाँद कहा था।


जहां चोट खाना, वहीं मुस्कुराना, 

मगर इस अदा से, कि रो दे ज़माना..!!

            

मुझे इतना भूल जाना की तुम जी सको

और इतना याद रखना की मैं जी सकूं..!


मेरी शायरी की छाँव में आकर बैठ जाते हैं,

वो लोग जो मुहब्बत की धूप में जले होते हैं।


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मां बनाती थी रोटी...

 माँ बनाती थी रोटी  पहली गाय की  आखरी कुत्ते की  एक बामणी दादी की  एक मेहतरानी बाई की  ...  हरसुबह सांड आ जाता  दरवाज़े पर  गुड की डली के लि...